श्रीमद्भागवत में जीवन पद्धति

श्रीमद्भागवत में जीवन पद्धति

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Quick Overview

श्रीमद्भागवत में भगवान विष्णु के सर्वश्रेष्ठ स्वरुप, अद्वितीय एवं मायारहित ज्ञान का विशद वर्णन किया गया है । इसकी विलक्षणता यह है कि इसका नैकर्म्य अर्थात कर्मों की आत्यंतिक निवृत्ति भी ज्ञान, वैराग्य एवं शक्ति से युक्त है ।  इसके श्रवण मात्र से भगवद्भक्ति की प्राप्ति हो जाती है और मनुष्य भव-बंधन से मुक्त हो जाता है ।


भागवत की भूमिका में नारद और भक्ति का संवाद है । भक्ति कहती है- 'उत्पन्ना द्रविणे साहे वृद्धि कर्णाटकेगता', अर्थात द्रविण देश में मेरा जन्म हुआ कर्नाटक में बड़ी हुई, फिर सारे देश घूमती हुई वृन्दावन में आयी, 'वृन्दावन पुनः प्राप्त नवीनेव स्वरूपिणी' । ब्रज में आकर भक्ति ने नया सौंदर्य पाया । इस तरह के उसकी यात्रा भौगोलिक सन्दर्भ में संस्कृति की अंतर्धाराओं की कहानी है । प्रस्तुत ग्रन्थ का प्रकाश भारतीय परिवेश में ही नहीं, बल्कि विश्व-परिप्रेक्ष्य में एक नयी दृष्टि एवं घटना का संवाहक है । श्रीमद्भागवत की सुभाषित कथा के अमृत-रस का मधुर पान प्रबुद्ध पाठक एवं श्रोता हमेशा करते रहे हैं । लेकिन इस पुस्तक में तत्कालीन जीवन-पद्धतियों से रु-ब-रु होंगे ।


लेखक ने गहन चिंतन-मंथन से नवनीत ग्रहण कर सार-रूप में जिन सामाजिक, व्यवहारिक, कलात्मक एवं आध्यात्मिक पक्ष का सृजनात्मक रूपायाम् प्रस्तुत किया है, वह काबिलेगौर से ज्यादा काबिलेतारीफ है । इसमें तत्कालीन समाज में गृह-निर्माण, आर्थिक व्यवस्था, चिकित्सा-पद्धति, धार्मिक सांस्कृतिक पूजा-आराधना, कला कौशल की प्रवृत्तियों की जानकारी तो मिलती ही है, अध्यात्म-दर्शन के उत्कर्ष का सुषमित समावेश विशेष अर्थपूर्ण है ।


भारतीय संस्कृति के आदर्श मूलक जिन तत्वों का निरूपण इनमे किया गया है, वे हमारी सांस्कृतिक चेंतना के बोधक हैं । ग्रन्थ में सृष्टिक्रम, जीवात्मा, पंचमहाभूत, शरीर के तत्व, तीनों गुणों-सतोगुण, रजोगुण और तमोगुणों का प्रकारांतर से विवेचन कालजयी होने का रहस्य उद्घाटित करता है । श्रीमद्भागवत में पौराणिकता के साथ योग-सूत्र और विज्ञान का विवेचन समकालीनता का प्रामाणिक परिबोधक है । युगचेतना, राष्ट्रीय संस्कृति एवं आदर्शों की अभिव्यक्ति, नीतिगत मूल्यों की प्रस्तुति, शिल्प-शैली की लाक्षणिक सृष्टि से कृति विशिष्ट बन पड़ी है । इसमें रामायण के विषय में एकत्व के समाहरण के साथ स्तुतियों की विशद प्रस्तुतियाँ मन को आस्था और विश्वास की प्रगाणता प्रदान करती हैं ।  निःसंदेह हिंदी की यह महान उपलब्धि लेखक की पहचान को पुख्ता करती है ।

Additional Information

Sub Title No
Author इंजी. हरिप्रकाश गुप्त
ISBN 10 Digit 8187471654
ISBN 13 Digit 9788187471653
Pages 395
Binding Hardcover
Year of Publication 2012
Edition of Book First
Language Hindi
Illustrations No

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